Friday, August 31, 2012

गज़ल: शहर में गढ्ढे नहीं मिले

बचपन में बहुत सुना था-कमल कीचड़ में खिलते हैं, बस सुना ही सुना है | एक दिन मन में आया कि अब तो हमने प्रगति के बहुत तरीके खोज लिए हैं, कहाँ कीचड़ मिलेगा, और कहाँ कमल | "शहरी-इंसान" के लिए कमल  एक कल्पना है या फिर बुके वाली दुकानों पर २० रुपये में मिलने वाला फूल |
खैर जाने दीजिए ऐसी बातों को जिनका अर्थ निकलने में ही परेशानी हो, पढ़िए एक गज़ल-
ताज़ा-ताज़ा, जैसे अभी भी धुँआ निकल रहा है |
शहर में गढ्ढे नहीं मिले

तरक्की के दौर में मुझे शहर में गढ्ढे नहीं मिले,
कीचड़ ने नस्ल बदली, मुद्दतों से कमल नहीं खिले |

समझदार ही हैं वो लोग जो मौका देख कर बोलें,
पागल हैं मजदूर क्या भला, जिनके होठ नहीं सिले |

ये भूख, गरीबी-लाचारी रोज आबरू खरीदती मिली,
अब भी कुछ बच रहा है क्या, ढहते क्यूँ नहीं किले ?

सुबह हुई तो लाखों का सामान बिखरा पाया है,
ये कैसी आंधी थी, उस पंछी के पेड़ के पत्ते नहीं हिले |

वो शख्स मुझे तोड़कर-छोड़कर जाने पे आमादा है,
अरे जाये भला, अब हम रोज-रोज सहते नहीं गिले |

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