Saturday, February 09, 2013

गज़ल : सपनो में इन झीलों को पार करता हूँ


सपनो में इन झीलों को पार करता हूँ
तेरी आँखों से मैं प्यार करता हूँ

जो थोड़ी-सी मिल जाये छूट तो
जिस्म एक आँखों को चार करता हूँ

कितनी खूबसूरत हो कुछ अंदाज़ा है
इन बाँहों में आओ शर्म-सार करता हूँ  

यूँ साफ़-साफ़ कहा तो क्या कहा
एक तीर से हजारों शिकार करता हूँ

इश्क में रोना-धोना अच्छी बात नहीं
कुछ गम ही तो हैं लाओ फरार करता हूँ

तुम्हारे अब्बा का थोडा खर्चा बढ़ाएँ
निकाह मंजूर मुझको इकरार करता हूँ

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