Monday, February 11, 2013

गज़ल: सुबह खिलता है, शाम तक टूट जाता है


सुबह खिलता है, शाम तक टूट जाता है
बना दो फूल ज़माने के काम आता है

वो बच्चा कितना भोला और मासूम है  
ज़रा खुलके हँस दे जमाना लूट लाता है

कोई दे दे हुनर, मुझे उस खिलौने-सा
जो टूट भी जाये तो चेहरा मुस्कुराता है

ख्वाहिश तो बहुत थी आसमां छूने की
अब घर न जाने पर परिंदा छटपटाता है

अकेलापन ही उसका सुकून छींन लेता है
कहने को नहीं हमसाया तो बड़बड़ाता है

वो जवान है और जवान ही रहेगा ताउम्र
जो एक चली जाए तो दूसरी पटाता है

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