Thursday, April 04, 2013

गज़ल: घर में कमरों की छतों की तरह होते हैं

घर में कमरों की छतों की तरह होते हैं 
बड़े बूढ़े एकदम बच्चों की तरह होते हैं 

कुछ चेहरों पर तो कुछ भी नहीं बनता 
तो कुछ चेहरे किताबों की तरह होते हैं

रौशनी कुछ हद तक जला भी सकती है 
बहते हुए अश्क छींटों की तरह होते हैं

ये पेट भरने की खातिर काम करते हैं
परिंदे खेतों में मजदूरों की तरह होते हैं

बच्चों की खुशियों का ख्याल रखना तुम
जवां जोड़े अक्सर परिंदों की तरह होते हैं

1 comment:

Meena Sharma said...

बहुत, बहुत सुंदर !!!

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