Sunday, April 28, 2013

गज़ल: तेरे घर की तरफ ही मेरा घर होता


तेरे घर की तरफ ही मेरा घर होता
कितना आसान घर का सफर होता

एक ही बाज़ार है हमारे मोहल्ले में
ना चाहो तो भी सामना उधर होता

सब मुस्करा दिए मेरे हाले दिल पे
काश चेहरा खुश इस बात पर होता

लोग आकर कश्तियों में ढूंढते मुझे
बस समंदर जानता मैं किधर होता

बड़े बूढ़े खुद मिलाते इश्कवालों को
ये सब होता तो नहीं है मगर होता

दोनों घराने समझ लेते आसानी से
जो प्यार उनको भी इस कदर होता

गर तुम बातें करते हो विरासत की
तो काँटों से भरा मेरा बिस्तर होता

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