Sunday, April 07, 2013

गज़ल: चलते चलते एक दिन गुज़रा ज़माना मिल गया


चलते चलते एक दिन गुज़रा ज़माना मिल गया
इस शहर में भी एक आशिक पुराना मिल गया

रब ने सबकी मर्जी का है कितना ख्याल रक्खा
तुझको दूर जाना मुझको पास आना मिल गया

नए जोड़ों की तरह ही हर गुफ्तगू हो शाम को
गिरती पड़तीं यादों को एक महखाना मिल गया

ये कश्ती हो किनारे में या कि अब हो बांध में
ये क्या कम है जीने का एक बहाना मिल गया

मुद्दतों से कुछ फासले थे एक दूजे के दिलों में
आज छोड़ीं रश्में तो दिल आशिकाना मिल गया

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