Sunday, April 28, 2013

गज़ल: किसने कहाँ है रात गुजारी किसको खबर


किसने कहाँ है रात गुजारी किसको खबर
जिस्मों को छोड़ बिस्तर पे चलो चाँद पर

हम भीड़ में तो नहीं थे तन्हाइयों में थे
क्यूँ न आया अपने सिवा कुछ भी नज़र

हँसा रोया और फिर बात की तस्वीर से
पर ये तो देखो तुम हो उधर मैं हूँ इधर

लगता है खुदा भी तुमसे खुश नहीं रहता
हमें भुलाने की दुआओं में होता नहीं असर

उम्मीद पर ही चलते रहें पटरियों की तरह
कभी मिलें न मिलें पर खत्म न हो सफर

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