Thursday, October 03, 2013

गज़ल: कल समंदर हार गया एक नदी से

कल समंदर हार गया एक नदी से
बेचारा कोशिश में था एक सदी से

बस नाकामियों ने इतनी समझ दी
आशिकों को मौत आ गई खुशी से

अँधेरे से अँधेरे में बात कर ली है
कितनी उम्मीदें रखें अब रौशनी से

वो लड़का भूल बैठा है अपना रस्ता
रोज दो दफा जाता था इस गली से

क्या तुमको है लोगों ने ठुकरा दिया
हमने भी रिश्ता तोड़ लिया सभी से

यहाँ तो रेत दर रेत है ‘मुन्तज़िर’
कहीं मर न जाना इस तिश्नगी से

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