Thursday, October 03, 2013

गज़ल: आज शाम चाहे नशा कम सा हो

आज शाम चाहे नशा कम सा हो
जो भी हो साकी दम-ब-दम सा हो 

गर सुर्ख होठों का निशाना है गर्दन
तो ख्वाहिश है मेरी जखम सा हो

मैं खुद ही बन जाऊंगा एक दास्ताँ
बस मेरा चाहने वाला कलम सा हो

आजिज़ आ चुका हूँ इस तन्हाई से
यारों कोई न कोई तो हम सा हो

हमसे तुझको बस गम ही तो मिले
जो मिले इस दफा मरहम सा हो

ये तीरे-पुर-सितम भी क्या सितम
अब तो जालिम कुछ बेरहम सा हो

ए जनाजे एक आखिरी ख्वाहिश
कातिल का भी दामन नम सा हो

झूठी खबरें भी मान लेता ‘मुन्तज़िर’
मगर उसमें कुछ तो दम सा हो

दम-ब-दम = प्राय:, बार-बार
आजिज़ = शक्तिहीन, उदासीन
तीरे-पुर-सितम = अत्याचारपूर्ण तीर

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