Friday, February 14, 2014

Muntazir Firozabadi ki Ghazal : हर गाँव हर शहर में रहता है

हर गाँव हर शहर में रहता है
बुरा शख्स हर घर में रहता है

सबके जहन में हैं पचास बातें
कब कोई एक सफर में रहता है

यह कहके डरा देता हूँ धूप को
मिटाने वाला शज़र में रहता है

कितनी तंग है फकीरी की चादर
उसका पाँव उसके सर में रहता है

यार इस बात का पता लगाओ
वाकई अँधेरा समंदर में रहता है

जाने वाला कब गया है छोड़कर
वो तो मेरी ही कबर में रहता है

‘मुन्तज़िर’ तो बात ही नही करता
न जाने किस असर में रहता है


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