Sunday, December 11, 2011

तुम तो भूल गई थी शायद : ( कविता एक अंतर्द्वंद में )


काश कि, तुमने खुद को
एक मीठी ग़ज़ल बनाया होता |
कुछ छूट रहे रिश्तों की,
परिभाषाओं को सजाया होता |

क्यूँ गढ़ती और लिखती रहीं ?
उत्पीडन, ओज- स्वर,
भ्रष्ट लोगो की निंदाओं की कहानी | 
काश लिखा होता,
शास्वत प्रेम- काव्य,
तो मिली होती,
किसी के अतुल्य प्रेम की निशानी  |
  

पर तुम तो भूल गई थी शायद ,
कि एक स्त्री थी तुम....
जिसकी कुछ मर्यादाएं होती है,
जिससे कुछ आशाएं होती है |
स्त्री जो सजती है, संवरती है,
नित पुरुष के बनाये सांचों में ढलती है | 

शायद स्त्री,
पुरुषार्थ के अधीन,
घर-गृहस्ती सजाने का
सामान होती है |
और यदि यह मार्ग न चुन सके,
इच्छाओं का दमन न कर सके,
तो अग्नि परीक्षा का आयाम होती है |

स्त्री, जो शायद इसलिए,
कोमल होती है,
ताकि पुरूषों द्वारा मनचाहे ढंग से मोड़ी जाये |
और यदि मार खाकर,
कुछ कठोरता आ भी गयी हो..
तो फिर देह ही नहीं अंतर्मन तक तोड़ी जाये |
    
क्या समय रहते तुम्हें
समझ आने लगा था ?
कि स्त्री,
जब तक लता, वेल, वल्लरी रहती है, 
अख़बारी समाज की कुटिल नज़र सहती है |

और इसीलिए तुम,
अपने भावों में करती रही,
समाज की हर व्यवस्था पर क्रोध |
लिखती रही,
पुरुष- प्रधान अनुसन्धान  पर शोध |

शोध जो ऐसे,
सीता, अनुसुइया की पूरी कहानी पढ़ रहे थे |
और शायद
पुरुषार्थ की,
सच्ची परिभाषाएँ गढ़ रहे थे |

पर तुम तो भूल गई थी ..
कि एक स्त्री थी तुम.....
तुम्हें परिभाषाएं बदलने का,
अधिकार नहीं था |
तुम्हारा हर शोध;
क्या निरंतर 
सरपंची-पौरुष पर वार नहीं था ? 

तुम भूल गयी थी शायद,
कि एक स्त्री थी तुम...
क्या अब भी तुम्हारा भूगोल
बिगडना तय नहीं था ?
क्यूँ तुम्हें चीत्कार मचाती
ज्यामिति का भय नहीं था ?

तुम भूल गयी थी शायद,
कि एक स्त्री थी तुम........

सादर : अनन्त भारद्वाज  


12 comments:

seema tomar said...

anant ji ye rachna aap ka master piece hai ....hriday ko jhakjhor diya gahraiyon tak.....aap ko mera salaam.....................

hemant pandey said...

bhai wah kya likhte hai ap.. ek aurat ki antaratma ko aapne apne shabdo me jahir kiya wo kabile tariff hai..

Anant Bhardwaj said...

बहुत बहुत धन्यवाद् सीमा जी, हेमंत भाई..
आधुनिक कविताओं में एक प्रयोग करके देखा है.. आपका समर्थन पाकर अभिभूत हुआ |

seema tomar said...

.........स्त्री, जो शायद इसलिए,
कोमल होती है,
ताकि पुरूषों द्वारा मनचाहे ढंग से मोड़ी जाये |
और यदि मार खाकर,
कुछ कठोरता आ भी गयी हो..
तो फिर देह ही नहीं अंतर्मन तक तोड़ी जाये |.......ye panktiyan poori rachna ki aatma lagi .........stree vedna ka charam raha.....

Palok Singh said...

Anant, Since you asked for a note....please tolerate my maybe extra-critical view...but thats how it is.....First, I must say, a beautiful work. Zubaan par tum yakeenan achhe ho..magar wo aksar forceful ya un-natural si lagti hai while you put them in a write-up....par is dafa tumhari third level Hindi kahin bhi atakti nahin maloom hui....bahut smooth, progressive aur collective thi tumhari language...congratulations for that...and coming to thought....I liked it pretty much....there were places put extremely brilliantly....only thing....i would like to see you idea wise on a better level and as i always say....more optimistic and promising ideas thoughts....looking more into tommorow and yesterday...!
But Overall, it was appealing read....Congratulations!

Anonymous said...

kavi anant ye ek achchi rachna h aapki...hume sach me achchi lagi....kuch words samajh me nhi aaye...par unka line meaning samajh me aaya......poori kavita mano hame ek roop dikha rahi ho......achcha likhte h aap


priya rawat

priya rawat said...

hum aapko badhayi de rahe h..aapke bright future ke liye.....aur hum aage bhi aapke dwara likhi achchi achchi kavitaye paddhna chahenge.....all d best:)

sakshi dixit said...

bahut badhiya abhivyakti , mere paas shabd nahi hai ......

dinesh gautam said...

आपकी रचना पढ़ी अनंत जी, हमारी आधी दुनिया और उनकी पीड़ा को मुखरित करती रचना आपके संवेदनशील मन का परिचय देती है।
- दिनेश गौतम

विवेक said...

ati sundar anant ji

Dr.Sushila Gupta said...

स्त्री, जो शायद इसलिए,
कोमल होती है,
ताकि पुरूषों द्वारा मनचाहे ढंग से मोड़ी जाये |
और यदि मार खाकर,
कुछ कठोरता आ भी गयी हो..
तो फिर देह ही नहीं अंतर्मन तक तोड़ी जाये |

antarman dravit ho utha.....aapka abhar.

Deepika Srivastava said...

Beautiful Anant....keep up this..

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