Monday, December 31, 2012

मैं कवि हूँ



कवि हूँ, कवि हूँ, मैं कवि हूँ |

जो स्वर करुण रुदन में
,
बेबस होकर चीख रहे थे |
जो हँसते-हँसते चेहरों में भी,
रोते - रोते दीख रहे थे |
उन निहित अकेले भावों को,
उन संबंधों, अलगावों को,
शब्दों का घर देने वाली,
छवि हूँ, छवि हूँ, मैं छवि हूँ |
कवि हूँ, कवि हूँ, मैं कवि हूँ |

जो सिक्कों को अनमोल बताये,
पर रुपयों का मोल न जाने |
जो रिश्तों की पहली कक्षा में,
पर माँ की हर आहट पहचाने |
उन नन्हे - नन्हे हाथों की,
उन कल आने वाले आघातों की,
कोमल उज्जवल सी दिखने वाली,
भवि हूँ, भवि हूँ, मैं भवि हूँ |
कवि हूँ, कवि हूँ, मैं कवि हूँ |

जो आदम, आदम की परिभाषा से,
मानव तक पहुंचे हैं |
जो आदम, आदम की परिभाषा से,
दानव तक पहुंचे हैं |
उन आड़े-तिरछे चेहरों पर,
उन हर शतरंजी मोहरों पर,
आग उगलता, पल-पल जलता,
रवि हूँ, रवि हूँ, मैं रवि हूँ |
कवि हूँ, कवि हूँ, मैं कवि हूँ |

सादर : अनन्त भारद्वाज 

Saturday, October 20, 2012

चातक : गीत एक दीर्घ अंतराल के बाद


इस गीत को बांचने से पहले नयी पीढ़ी को बता दिया जाना चाहिए कि चातक भारत एवं अन्य देशों में पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का पक्षी होता है जो अपनी कुल-मर्यादा को निभाते हुए प्यासा मर जाना पसंद करता है पर स्वांति नक्षत्र में बारिश की पहली बूँद ही ग्रहण करता है |

तुम स्वांति नक्षत्र की बूँद बनी,
मैं चातक तुम्हारा बन ना सका |

मोर आए ‘हां’ मन के, विचरने लगे |
प्रेम-सागर में हम-तुम, उतरने लगे |
सूने आँगन में तुम, दूब बनके उगी,
मैं सावन तुम्हारा, बन ना सका |
तुम स्वांति नक्षत्र........................
मैं चातक तुम्हारा........................

पावन मूरत थी वो, दूर तक नाम था |
प्रेमियों के लिए, बस वही धाम था |
थाल मंदिर में तुम यूँ, सजाती मिलीं |
प्रेम-दीपक था, फिर क्यूँ जल ना सका ?
तुम स्वांति नक्षत्र........................
मैं चातक तुम्हारा........................

एक बगिया दिखी, जिसमे फूल खिले |
याद आए वो पल, कैसे हम-तुम मिले |
मन के उपवन में तुम, वो तितली बनी,
उड़ते ही फूल-सा, क्यूँ मचल ना सका ?
तुम स्वांति नक्षत्र........................
मैं चातक तुम्हारा........................

लड़ना मेरा मुझे, याद आया था जब |
दोषी खुद को ही मैंने, पाया था तब |
यादों में तुम मेरी, आती-जाती रहीं |
मैं आँसू था फिर क्यूँ, छलक ना सका ? 
तुम स्वांति नक्षत्र........................
मैं चातक तुम्हारा........................

मैंने सोचा बहुत, पर भुला कैसे दूँ ?
उन खतों को जमीं में, दबा कैसे दूँ ?
माफ करना मुझे, अब भी सांसों में हो |
मैं ही नादां था तुझको, समझ ना सका |
तुम स्वांति नक्षत्र........................
मैं चातक तुम्हारा........................

Tuesday, October 09, 2012

चलो आज लौटा ही दो वो पन्ने ( 52 पंक्तियाँ )


अभी कुछ दिनों पहले आप सभी के साथ कुछ पंक्तियाँ साझा की थीं | उन्ही पलों, पंक्तियों से मिलता-जुलता लिखा है, अभी-अभी (मूड बन गया था ना, 'एवेहीं' )
"मेरा प्यार लुटेरा था" श्रृंखला में दूसरी कड़ी --------------------------->

कविता : चलो आज लौटा ही दो वो पन्ने ( 52 पंक्तियाँ )


न तो तुम्हारा प्रेम मिला, न तुम,
न तो जमाना रूठा था, न हम |
और तुम्हें भी तो मात्र ‘प्रेम’ शब्द से लगाव था,
फिर क्यूँ मध्य में ये कुंठित-सा अलगाव था ?
तुम्ही तो हमेशा,
अपने हाथों की मेहदी में सजा देतीं थीं,
दो पागल बादलों को मिला देतीं थी |
मुझे क्या पता था कि बस लिखती थीं,
पता नहीं किस अग्नि में जलती थीं |
अच्छा !!!! मात्र लिखती थीं,
जीती कुछ और ही थीं |
तुम न मिल सकीं, न मिलोगी कभी,
जानता हूँ भलीं-भांति |


चलो आज लौटा ही दो वो पन्ने |
जवाब नहीं आया......
क्या ! क्या कहा ?
अब नहीं रहे वो ! जला दिए !
इतनी निष्ठुर तो नहीं थीं तुम,
जान गया था १ ही वर्ष में |
ऐसी होती तो बुरा न मान जातीं,
उस पहली मुलाकात वाले दिन ही |
अच्छा सच-सच बताना,
क्या सचमुच झेल रहीं थी अब तक मुझे |
या इन्तज़ार में थी मेरी किसी गलती के,
कि मैं गलती करूँ और कहो-
अब नहीं सुधारा जाता, छोड़ दूंगी तुम्हें |


चलो आज लौटा ही दो वो पन्ने |
सौ, दो-सौ खत भेजे थे तुम्हें मनाने,
सब वापस लौट आए,
पता नहीं तुमसे मिलके भी आए हैं या नहीं |
शायद नहीं आयें होंगे,
नक्कारे हैं ना मेरी तरह, मेरे खत |
काश मिल आते तुमसे तो,
१ तो अपने साथ लेकर ही आते |
यकीं है इतना तो,
वो बात अलग है कि खत खाली होता |
आज भी सोचता हूँ तो गुस्सा आता है,
क्या खाली खत भी नहीं लिखा जाता था तुमसे ?
खैर अब इंतज़ार क्या खाली खत का |


चलो आज लौटा ही दो वो पन्ने |
अच्छा अच्छा, सुन लिया, गुस्सा हो,
कभी नहीं मानोगी, ऐसा ही ना |
कभी कभी सोचता था कि,
राख ठंडी होने के बाद,
फिर से कोशिश करूँगा तुम्हें मनाने की |
पर हाय-री ये किस्मत ?
तुम इसे भी भांप गईं |
सच में प्यार बहुत करतीं थीं न मुझसे,
मैं कब, कैसे, कहाँ, मनाऊंगा तुम्हें ?
पूर्ण आभास था उन नफरत के दिनों में भी | 
पर जानना चाहूँगा अंतिम दिन तक, 
कहाँ गयीं वो तुम्हारी, प्रेम कवितायेँ ?

Saturday, September 29, 2012

मेरा प्यार लुटेरा था

प्रेम हमेशा अद्भुत होता है, अप्रतिम | रूठना, मनाना, हँसाना, रिझाना ये सब तो प्राय होते हैं पर अक्सर ये सब मौन परिवेश में बदल जाता है | प्रेम में कोई बुरा नहीं होता, बस प्रतिकूल स्तिथि और हमारी नासमझी उस रेत के घरोंदे पर सागर की लहरों सी चली आतीं हैं | कब हमारी "छोटी-छोटी गलतियाँ" उस आशियाने का रूप बदल दें, पता ही नहीं चलता | झटका तब लगता है जब लहरें पूरे वेग से सब कुछ तबाह कर चुकी होतीं हैं |

कल कोई पुरानी ऑडियो पल्ले पड़ गई, कोई ४-५ साल पुरानी | २-३ बार सुनकर सोया, आवाज़ बहुत अच्छी थी, पर पहचान नहीं पा रहा था | हाँ, न जाने कैसे ?? अब आगे क्या बोला था, क्या बोलना था, सब कुछ पता था | सचमुच वक्त हर जख्म पर मरहम लगाना जानता हैं |
फिर बहुत सी "पेंटिंग्स" देखीं ; जब कविता नहीं, 'पेंटिंग' करता था |
फिर वो 'पल' छूट गया, पेंटिंग छूट गई, लोग छूट गए |
एकाकी आदमी एकाकी हो गया और कविता उसकी संगिनी |

तब की एक कोई छोटी-सी कोशिश, छोटी-सी कविता :

मेरे सारे घर खाली थे, ख़ामोशी का डेरा था |
मेरा दिल तो मेरा दिल है, मेरा प्यार लुटेरा था ||

एक सपना बनकर आया था वो, मेरे दिल पर छाया था,
और वो चाँदनी-सा सुन्दर मुखड़ा मेरे मन को भाया था |
पर किस्मत भी क्या साँप रही, एक अज़नबी सपेरा था |
मेरा दिल तो मेरा दिल है, मेरा प्यार लुटेरा था ||

कई वक्त लगा, कई साल लगे, ये ताना-बाना बुनने में,
उस सुंदरी मनमोहिनी से प्यार के लब्ज़ सुनने में |
दिल में था इंतज़ार बहुत, पर उदासियों का डेरा था |
मेरा दिल तो मेरा दिल है, मेरा प्यार लुटेरा था ||

एक दिन अचानक, उगते सूरज से एक किरण आई,
और लगा उसे प्यार की हर पहेली समझ आई |
उसको भी था प्यार हाँ मुझसे, यादों में मेरा बसेरा था |
मेरा दिल तो मेरा दिल है, मेरा प्यार लुटेरा था ||

Tuesday, September 18, 2012

एक कवि सम्मेलन के दौरान (हिंदी दिवस - १४ सितम्बर २०१२)




(1) चंद अल्फाज़ उर्दू के बताएँगे भला कैसे ?

चंद अल्फाज़ उर्दू के बताएँगे भला कैसे ?
गज़ल तालीम है मेरी, या मैं कह नहीं सकता |

पहाड़ों से निकलता हूँ, हाँ दरिया नाम है मेरा,
समुन्दर कह रहा था कल, कि मैं बह नहीं सकता |

मुझपे मंदिर बनाओ तुम, मुझपे मस्जिद बनाओ तुम,
बुनियादी काम है मेरा, तोड़ो मैं ढह नहीं सकता |

जिस्म पर ज़ख्म खाऊँगा, थोड़ी मरहम लगाऊँगा,
दिलों में घात ना करना, मैं अब सह नहीं सकता |

अमीरों का हुनर देखो, ये दौलत क्या सिखाती है?
कोशिश है मुँह-भराई की, मगर चुप रह नहीं सकता |

(2) शौक अब भी पुराने रखता हूँ

मैं यूँ तो शौक अब भी पुराने रखता हूँ
तेरी खातिर खुद की जिद पे पैमाने रखता हूँ |

बस जरा मजबूर हूँ, इश्क में मगरूर हूँ,
जैसे-जैसे करती है, सारे बहाने रखता हूँ | 

ऐरे-गैर शायर हो गए, घूँट पीके जाम के,
उनसे नशीला जाम क्या ? मैखाने रखता हूँ |

(3) गज़लों में अपनी तुम, मेरा जब नाम लिखना

गज़लों में अपनी तुम, मेरा जब नाम लिखना,
वही मौसम, वही दरिया, वही पैगाम लिखना |

खत तो मिलते रहते हैं, इश्क औ मोहब्बत के,
जिस भी खत से आए खुशबू, मेरा ईनाम लिखना |

कैसे खुश रहता हूँ, उस साकी की बातों पर,
टूट जाओ खुद ही, तो नशीला जाम लिखना |

सच्चाई को झूठ, समझने वाले ज्यादा हैं,
तुम शाम को सुबह, सुबह को शाम लिखना |

कतारों में मिलेंगे, तुझको तेरे चाहने वाले,
ज़रा सी चूक करना, मुझे बदनाम लिखना |

कहीं गफ़लत न हो जाए, ए सल्तनत वालों,
खास को खास, आम को आम लिखना |

© अनन्त भारद्वाज

Friday, September 07, 2012

मेरी प्रकाशित कहानियाँ

मेरी लिखित कुछ कहानियाँ प्रकाशित हुई, सौभाग्यवश २ इन्टरनेट-लिंक्स मिले हैं अभी तक |
शेष मिलते ही, या और कहानियाँ प्रकाशित होते ही शेयर करूँगा |
यहाँ पूरी कहानियाँ लिखना व्यर्थ होगा, अत:एव मात्र लिंक साझा कर रहा हूँ | पढ़िए और मेरा मार्गदर्शन कीजिये -
1. कहानी - इंतकाम

2. कहानी - क्लाईमेक्स



Friday, August 31, 2012

गज़ल: शहर में गढ्ढे नहीं मिले

बचपन में बहुत सुना था-कमल कीचड़ में खिलते हैं, बस सुना ही सुना है | एक दिन मन में आया कि अब तो हमने प्रगति के बहुत तरीके खोज लिए हैं, कहाँ कीचड़ मिलेगा, और कहाँ कमल | "शहरी-इंसान" के लिए कमल  एक कल्पना है या फिर बुके वाली दुकानों पर २० रुपये में मिलने वाला फूल |
खैर जाने दीजिए ऐसी बातों को जिनका अर्थ निकलने में ही परेशानी हो, पढ़िए एक गज़ल-
ताज़ा-ताज़ा, जैसे अभी भी धुँआ निकल रहा है |
शहर में गढ्ढे नहीं मिले

तरक्की के दौर में मुझे शहर में गढ्ढे नहीं मिले,
कीचड़ ने नस्ल बदली, मुद्दतों से कमल नहीं खिले |

समझदार ही हैं वो लोग जो मौका देख कर बोलें,
पागल हैं मजदूर क्या भला, जिनके होठ नहीं सिले |

ये भूख, गरीबी-लाचारी रोज आबरू खरीदती मिली,
अब भी कुछ बच रहा है क्या, ढहते क्यूँ नहीं किले ?

सुबह हुई तो लाखों का सामान बिखरा पाया है,
ये कैसी आंधी थी, उस पंछी के पेड़ के पत्ते नहीं हिले |

वो शख्स मुझे तोड़कर-छोड़कर जाने पे आमादा है,
अरे जाये भला, अब हम रोज-रोज सहते नहीं गिले |

Saturday, August 25, 2012

हर पल में सदियाँ हैं

कहते हैं सागर की लहरें( या गहरी नदी ), घड़ी की सुईयाँ और तमाम ऐसी चीजें किसी की 'प्रतीक्षा' नहीं करतीं |
मैंने उनमें भी एक इंतज़ार, एक सोच, एक जीने का आयाम देखा तो ३ बंध जोड़े हैं, जो आगामी प्रकाशित काव्य-संग्रह 'प्रतीक्षा' में एक नया पन्ना जोडेंगे | प्रस्तुत है कविता 'हर पल में सदियाँ हैं' -

जीवन नदी के तट पर बैठा,
तीन बरस से अविलंबित-सा |
तट होता दूर चला जाता है,
ज्यों-ज्यों रस है प्रेम का भरता |
संयम की नौका मैं लेकर,
तुझको तट तक पहुँचाता हूँ |
पर तट से बढती दूरी देख,
स्वयं टूट-टूट रह जाता हूँ |
‘नदी’ हो तुम यूँ एक ‘प्रतीक्षा’,
या फिर उसमें भी नदियाँ हैं ?
प्रतिपल तेरे लिए है कटता,
या फिर हर पल में सदियाँ हैं ?

कितने ही काल-खण्ड है ढोती,
ना तो थकती, ना हीं है सोती |
तुझे देख मैं तुझसे मिलता,
तू खुद से ही अनभिज्ञ रही |
शायद आने वाले मधुर मिलन का,
तुझको अनुमान रहा होगा |
इसी बहाने समय बिताने का,
ये नाटक खूब रचा होगा |
‘घड़ी’ हो तुम यूँ एक ‘प्रतीक्षा’,
या फिर उसमें भी घड़ियाँ हैं ?
प्रतिपल तेरे लिए है कटता,
या फिर हर पल में सदियाँ हैं ?

उस कुल-दीपक का स्वागत,
करती थी दीपों की ज्वाला |
अब न मिले ढूँढे से दीपक,
और न वह दीपों की माला |
विकसित भी जब राष्ट्र हुआ,
मालाएँ बनतीं हैं लड़ियाँ |
गुणधर्म अभी भी शेष रहा,
तकतीं हैं पुरुषोत्तम को लड़ियाँ |
‘लड़ी’ हो तुम यूँ एक ‘प्रतीक्षा’,
या फिर उसमें भी लड़ियाँ हैं ?
प्रतिपल तेरे लिए है कटता,
या फिर हर पल में सदियाँ हैं ?

Wednesday, July 25, 2012

' परिंदा '



पिंजरा खोला देखा मैंने, उसे आस नहीं थी उड़ने की,
जिद्द शायद खो दी थी उसने, सलियों से लड़ मरने की,
ये गम था एक परिंदे का, या गम की एक गवाही थी,
क्या सच में उड़ना भूल गया, या फिर उसकी चतुराई थी ?

कैसे आखिर बंद हुआ ये, कैसे किस्मत इसकी छली गयी?
कैसे आखिर जी लेता है, जब खुशियाँ इसकी चली गयीं ?
ये भूल चुका है, चिर-परिचित और मित्रों की भाषाओँ को,
या माँ के दाना लाने को और उन पेड़ों की शाखाओं को ?
ये गम था एक परिंदे का...........................
क्या सच में उड़ना भूल गया......................

अपने पंखो से नापी दुनिया इसको सही - सही लगती है,
ख़ामोशी भी इसकी जैसे गाथा कही - कही लगती है |
खुला गगन और मुक्त पवन, अब तो कुछ भी रहा नहीं,
आखिर हम क्या सहते है, जब इसने कुछ भी कहा नहीं |
ये गम था एक परिंदे का...........................
क्या सच में उड़ना भूल गया.......................

Wednesday, June 06, 2012

आँखें

उन खूबसूरत आँखों की प्रतीक्षा में ये प्रतीक्षारत आँखें 


आँखें

बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

कदम दर कदम, झील में है उतरना,
हो चाहत डुबोने की, फिर क्या संभलना ?
इनकी गहराईयों में है, जन्नत हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

इनके आंसू भी अब जैसे गंगा समान  ,
पलकें झुकते ही लगतीं हैं पीर का ज्ञान |
बना दीजिये हाँ, अब तो ये किस्मत हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

नज़रों को तुम यूँ न ऐसे घुमाओ,
खड़ा पास हूँ, अब तो दिल में बसाओ |
इन आँखों से दिल तक हैं राहें हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

सादर : अनन्त भारद्वाज

Tuesday, May 08, 2012

मेरी भी चाहत है ऐसी...

मैंने कई बार श्रृंगार की कवितायेँ लिखीं, पर कहीं न कहीं ऐसा लगा कि एक कवि का राष्ट्रधर्म उस पर हावी हो रहा है, और हो भी क्यूँ न ? 'राष्ट्रकवि' मैथिलीशरण गुप्त कहते है वह ह्रदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
कविता के माध्यम से मैंने एक गीतकार, चित्रकार, शिक्षक और नवयुवक की उस मनोदशा को कहा है, जो अपनी प्रेमिका से माफ़ी चाहते हैं, क्यूंकि उनका राष्ट्रधर्म उन्हें बुला रहा है | कविता एक प्रयोग है, जिसमें ४ पंक्तियाँ श्रृंगार में और ४ पंक्तियाँ ओज में व्यक्त की हैं | प्रयोग कहीं ठीक-ठीक हुआ हो तो आपका आशीष चाहता हूँ | कविता का एक अंश प्रस्तुत है, आपकी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं, तो जल्द ही इसे पूर्ण करूँगा -

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तुझ पर गीत लिखूँ और गाऊँ मैं |
मेघ-मल्हारों, कोयल-पंछी,
वाले राग सुनाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं राग नहीं गढ़ सकता हूँ |
भारत माता पीड़ा में है,
गान नहीं लिख सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तुझ पर ही मिट जाऊं मैं |
मुझको हर पल चाहने वाली,
तेरा ही चित्र बनाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं रंग नहीं भर सकता हूँ |
मुझको जयचंदों से लड़ना है,
बस धरा लाल कर सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तेरा नाम पढाऊँ मैं |
कुमकुम-अक्षत, कंगन-बिंदिया,
से तेरा रूप सजाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं रूप सजा नहीं सकता हूँ |
माँ पर कालिख पोती गयी,
वो बात भुला नहीं सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
चाँद-सितारे लाऊँ मैं |
प्रेम-ज्ञान मुझको भी आता,
संग चलूँ सिखलाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं साथ नहीं चल सकता हूँ |
माँ बेटों से छली गई,
आघात नहीं सह सकता हूँ ||

सादर : अनन्त भारद्वाज 

Saturday, May 05, 2012

यूँ न दीपक जला

एक पंक्ति जो शायद आज-कल प्रत्येक लड़की कहती है “सारे लड़के एक जैसे होते है” ; मेरे मन में अक्सर खटकती है | तब पहली बार पुरुष के समर्थन में और इस पंक्ति के विरोध में एक गीत लिखा | गीत को पढ़ने से पहले कुछ इसकी भूमिका के बारे में कह दूँ, ताकि बात सीधी-सीधी आप तक पहुँचे | गीत के माध्यम से एक नवयुवक लड़कियों द्वारा किये गए भावनात्मक शिकार से बचना चाहता है, जो कहीं न कहीं उन्हें रिझाने का प्रयास करतीं है | परन्तु वह प्रकृति के नियमों से भी वाकिफ़ है | इसलिए अंत में एक समझौता करता है कि कुछ तुम बदलो, कुछ हम | प्रेम को एक आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाये, ताकि उसमें प्रदर्शन नहीं, दर्शन दिखे, लोगों को सीख मिले और नयी संस्कृति को आयाम |
गीत प्रस्तुत है - 


लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब में काव्य - पाठ

यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |
मैं पुरुष हूँ सदा, मेरे मन की व्यथा,
क्यूँ इतिहास में हर कली को ठगा?
न फूलों का मोह, फिर क्यूँ भँवरा बनूँ,
ये कलंक है जो आज मिट जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

न पतंगे उड़ा, ना हीं पल्लू घुमा,
एक तपस्वी भी कब तक बचा था भला?
जो उर्वशी-सी लगीं, मेनका-सी सजीं,
तो निमंत्रण यूँ मुझको फिर मिल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

प्रेम यदि हो प्रिये, भाव-समर्पण प्रिये,
जब हो मीरा दिवानी, राधे रानी प्रिये,
अर्चना तब करूँ, बनके थाली सजूँ
सैकड़ो ज्योति का दीप जल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा ||

सादर : अनन्त भारद्वाज 

Thursday, April 12, 2012

“ कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ? ”




कविता जो भ्रष्टाचार , विभाजन, आरक्षण, गरीबी, गन्दी राजनीति, गुलामी के आसार, सीमा- युद्ध, अभिवावकों का अनादर, बेरोजगारी जैसे देश में व्याप्त तमाम आयामों को जोड़कर मैंने २ वर्ष पूर्व लिखी ..

दिल की संवेदनाओ  को मैं मार कैसे दूं
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?
पथ भ्रष्ट हो गया, पथिक भ्रष्ट  हो गया,
गाँधी और सुभाष का ये राष्ट्र भ्रष्ट  हो गया,
चंद रुपयों को भाई भाई भ्रष्ट  हो गया,
जगदगुरु- सा मेरा देश भ्रष्ट  हो गया..
राम राज्य लाने वाली सरकार कैसे दूं?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

भ्रष्टाचार की खातिर शत्रु सीमा से सट जाते हैं  ,
बुनियादी आरोपों से अब संसद तक पट जाते हैं ,
मानचित्र में हर साल राज्य बट जाते हैं,
भारत माता के कोमल अंग कट जाते हैं..
इस अखंड राष्ट्र को आकर कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आरक्षण  विधान कर नेता यूँ सो जाते हैं,
मेहनतकश बच्चे खून के आंसू रो जाते हैं,
कर्म करते -करते कई युग हो जाते हैं,
कलयुग  के कर्मयोगी पन्नो में खो जाते हैं,
कृष्ण ने जो दे दिया वो सार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

माँ अपने बच्चे को ममता से सींच देती है,
मंहगाई  की मार गर्दनें खीच देती है,
रोटी के अभाव में माँ बच्चा फेंक देती है,
फिर भी पेट ना भरा तो जिस्म बेच देती है,
इस पापी पेट को आहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

एक लाठी वाला पूरी दुनिया  पे छा गया,
दूजा  सत्ताधारी तो चारा तक खा  गया,
चम्बल के डाकुओं को संसद  भी भा  गया,
शायद जीत जायेगा लो चुनाव   गया,
ऐसे भ्रष्ट नेता को विजय हार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

तिब्बत चला गया अब कश्मीर चला जायेगा ,
यदुवंशी  रजवाड़ों  में जब बाबर घुस  आएगा ,
देश का  सिंघासन चंद सिक्कों में बँट जायेगा ,
तब बोलो भारतवालो तुम  पर क्या रह जायेगा  ?
आती  हुई  गुलामी  का समाचार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

सीमा  के खतों  में हिंसा तांडव करती  है,
सूनी  राखी  देख कर बहिन रोज़ डरती  है,
नयी दुल्हन सेज पर रोज़ मरती है,
और बूढी  माँ की आँखें रोज़ जल भरती है,
माँ को बेटे की लाश का उपहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आज के भी दशरथ चार पुत्रों को पढ़ाते है,
फिर भी चार पुत्रों पर वो बोझ बन जाते है,
कलयुग में राम कैसे मर्यादा निभाते है ?
राम घर मौज ले और दशरथ  वन  जाते है,
ऐसे  राम को दीपों की कतार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

मानव अंगों का व्यापार यहाँ खिलता  है,
शहीदों के ताबूतों  में कमीशन भी मिलता है,
बेरोज़गारों  का झुण्ड चौराहों  पे दिखता है,
"फील गुडकहने से सत्य नहीं छिपता  है,
देश की प्रगति  को रफ़्तार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?


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