Monday, February 11, 2013

गीत: मेरी यादों को वो थपकी, दे दे के सुलाती है


मेरी यादों को वो थपकी, दे दे के सुलाती है
पल भर मुझको याद करे, पल भर में भुलाती है,
मेरी यादों को वो थपकी, दे - दे के सुलाती है |

वो प्रेम का पहला था पन्ना जो घर तक जाता था,
फिर सकुचाते-शरमाते मेरी जेब से बाहर आता था,
उस पहले पन्ने को उसने खत का नाम दिया होगा,
फिर घूंट-घूंट करके उसने लब्जों का जाम पिया होगा,
वो जाम वहीँ पर थम जाता तो भी तो अच्छा था,
अब खत में खुद ही जलती है और उन्हें जलाती है |
मेरी यादों को वो थपकी, दे - दे के सुलाती है |

वो उसका शायद हिम्मत करके मुझसे मिलना था
अजी मिलना क्या था वो तो होठों का सिलना था
गर उस पर भी मैं शरमा जाता तो फिर क्या होता
अजी होना क्या, मैं बोला फिर जैसे कोई रट्टू तोता
तब याद है घंटों खूब हंसी थी वो उस रट्टू तोते पर
अब खुद भी कितना रोती है और मुझे रुलाती है |
मेरी यादों को वो थपकी, दे - दे के सुलाती है |

मुझको तो कुछ भी याद नहीं पर उसकी थी ड्यूटी
तारीखें छिपकर लिखती थी वो क्यूटी - सी ब्यूटी
जब कभी अकेली हो जाती, दरिया सा बहता था
इस दो हंसों वाले जोड़े को पास रखो कहता था
अब लाख दफा फटकार चुकी कि दूर रहो मुझसे
फिर क्यूँ पगली उन हंसों के जोड़ों को सजाती है ?
मेरी यादों को वो थपकी, दे - दे के सुलाती है |
  

गीत: वो मेरी सहेली है, कितनी अलबेली है


रातों-रातों में जाने क्यूँ, वो जगती रहती है
बातों-बातों में जाने क्यूँ, बच्चों सी लड़ती है   
सुलझी-सी दिखने वाली, उलझी-सी पहेली है
हाँ वो मेरी सहेली है, कितनी अलबेली है |

होठों को जब खोले, टॉफी सी घुलती है
कान्हा की मुरली है, मीरा सी दिखती है
पूजा में सजने वाली, मिसरी की डेली है
हाँ वो मेरी सहेली है, कितनी अलबेली है |

कभी दोस्त बनाये तो, ये जग भी छोटा है
कभी रूठ जाये तो फिर, हर कोई खोटा है
सबको अपना कहती, फिर भी अकेली है
हाँ वो मेरी सहेली है, कितनी अलबेली है |

सुन्दर-सा रूप है उसका, रब ने तराशा है
शरमा के इठलाना ही उसकी परिभाषा है
वो तो किसी राजा की सुन्दर सी हवेली है
हाँ वो मेरी सहेली है, कितनी अलबेली है |


गज़ल: सुबह खिलता है, शाम तक टूट जाता है


सुबह खिलता है, शाम तक टूट जाता है
बना दो फूल ज़माने के काम आता है

वो बच्चा कितना भोला और मासूम है  
ज़रा खुलके हँस दे जमाना लूट लाता है

कोई दे दे हुनर, मुझे उस खिलौने-सा
जो टूट भी जाये तो चेहरा मुस्कुराता है

ख्वाहिश तो बहुत थी आसमां छूने की
अब घर न जाने पर परिंदा छटपटाता है

अकेलापन ही उसका सुकून छींन लेता है
कहने को नहीं हमसाया तो बड़बड़ाता है

वो जवान है और जवान ही रहेगा ताउम्र
जो एक चली जाए तो दूसरी पटाता है

Saturday, February 09, 2013

गज़ल : सपनो में इन झीलों को पार करता हूँ


सपनो में इन झीलों को पार करता हूँ
तेरी आँखों से मैं प्यार करता हूँ

जो थोड़ी-सी मिल जाये छूट तो
जिस्म एक आँखों को चार करता हूँ

कितनी खूबसूरत हो कुछ अंदाज़ा है
इन बाँहों में आओ शर्म-सार करता हूँ  

यूँ साफ़-साफ़ कहा तो क्या कहा
एक तीर से हजारों शिकार करता हूँ

इश्क में रोना-धोना अच्छी बात नहीं
कुछ गम ही तो हैं लाओ फरार करता हूँ

तुम्हारे अब्बा का थोडा खर्चा बढ़ाएँ
निकाह मंजूर मुझको इकरार करता हूँ

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