Sunday, March 31, 2013

गज़ल: इस बात पे घूरता यह आसमान है

इस बात पे घूरता यह आसमान है
कि कैसे इस घर में सारा जहान है 

फूलों पे फिर से तितलियाँ आएँगी
मेरी नहीं एक फकीर की जुबान है 

कुछ बुरे वक्त में भी जीना सीख
तेरी ही आजमाइश का इम्तेहान है 

इस दौर में यह कैसे अच्छा होगा
यह आदमी आदमी नहीं इंसान है

अब और कितना मजाक बनोओगे
कोई गरीब तो नहीं है संविधान है

शहर के किरायदारों से गाँव भला
वहाँ टूटा फूटा सही एक मकान है

आँगन के पेड़ भी बँट गए घर में
बदला बदला सा मेरा खानदान है

गज़ल: जिंदगी यूँ ही मुस्कुराने लगी

जिंदगी यूँ ही मुस्कुराने लगी 
एक-एक सबक सिखाने लगी 

बंद आँखों से जो देखा तुम्हें
हर बाग से खुशबू आने लगी 

नहाने किनारे पे आई हो तुम
नदी सोचकर गुनगुनाने लगी

मुझे थी जिसकी जरुरत बहुत
उसी को मौत क्यूँ आने लगी

जी गम बाँटने से होता है कम
न मेरी सुनी खुद सुनाने लगी

मैं बाज़ार में था अकेला खड़ा
वो बोली पे बोली लगाने लगी

फिर उनकी मैंने छुट्टी न की
कभी याद आने तो जाने लगी
 

गज़ल: वाह मौला तेरी भी दुकनदारी हो गयी


वाह मौला तेरी भी दुकनदारी हो गयी
जिंदगी औ मौत सब तरकारी हो गयी

किसी को तो जल्दी औ किसी को लेट
अब तेरी फाइल भी सरकारी हो गयी

सोचकर ही मुझे तो हंसी आ जाती है
रपट लिखाने गया गिरफ़्तारी हो गयी

लो बंटवारा करना बच्चे भी सीख गए
ये जमीन तो तुम्हारी ये हमारी हो गयी

मुफ्त के मुर्गे सब तबियत से चर गए
हमको छोड़ के सबको बीमारी हो गयी

आज भी सारा दिन वो काम ढूँढता रहा
लो बनिए पे आज फिर उधारी हो गयी

Thursday, March 14, 2013

गज़ल: अमानत खो गई होशो-हवास किधर गया


अमानत खो गई होशो-हवास किधर गया
मैं उसे ढूँढने कभी इधर कभी उधर गया

कल ही तो उसके साथ शाम गुजारी थी
कोई इतना परेशां एक दिन में मर गया

अब क्या खुलके चीखोगे गर ये मैकदा है
यहाँ वो भी चुप हैं जिनका हमसफ़र गया

कल की खबर ही नहीं है किसी को यहाँ
होंसला तो देखो वादे जन्मों के कर गया

कब तलक यहाँ बैठोगे और क्या पाओगे
जिसको ढूंढ रहीं हैं नज़रें वो तो घर गया 
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