Thursday, July 04, 2013

गज़ल: खेल खत्म हो चुका तो होश में आओ

 मुन्तज़िर फिरोज़ाबादी

खेल खत्म हो चुका तो होश में आओ
यारों अब तो चराग अक्ल के जलाओ

सुना है शहर के सभी मैखाने बंद है
जानशीं ज़रा अपनी आँखों से पिलाओ

साथ साथ चलने का वादा तय हुआ है
ये हाथ तो मेरा है तुम अपना बढ़ाओ

इश्क के चर्चे दोनों के घर पहुँच गए
अब तो कोई निकाह की बात चलाओ

क्या हमीं निभाते रहें रिश्ते उम्र भर
अब थोडा रिश्ते-दिल तुम भी निभाओ

गज़ल: लाशों के बदले कुछ मुआवजे बाँटती है

गज़ल: मुन्तज़िर फिरोज़ाबादी

लाशों के बदले कुछ मुआवजे बाँटती है 
हुकूमत इस तरह अपने पाप छाँटती है 

कच्चे मकां पे देखो इमारत बन गई
चिड़ियाँ यहाँ रहती थी खाक छानती है 

दुनिया की नज़रों से कौन नहीं वाकिफ़
और ये माँ है कि बेटी को डाँटती है 

सेकीं हैं हादसों पे हर पार्टी ने रोटियाँ
हाँ दोष था हमारा ये कौन मानती है 

हालात ज्यों के त्यों हैं शहर में यारों 
वादे किये पूरे हर सरकार छापती है 

अमीर हुए अमीर औ मौत हुई महँगी
ये गरीबों की दुनिया मौत माँगती है
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