Tuesday, October 22, 2013

मुन्तज़िर फिरोज़ाबादी साहब की गजलें

(1)
नज़्म लिखूं या प्यार करूं
या फिर कोई व्यापार करूं

तू ही बता ए कर्जे-जिंदगी
मौत से कितना उधार करूं

अपने गम सब छुपे-छुपाए
गम को क्यूँ इश्तिहार करूं

कोई कहता जाने दूँ अब
तो कोई कहे इंतज़ार करूं

सबने अपनी कह ली हो
तो मैं भी ज़िक्रे-यार करूं

जुगनूँ को आफताब बनाया
अब कितना जिम्मेदार करूं

तू खुद को आँगन कर ले  
मैं खुद को दीवार करूं

तारे अब तक जाग रहे है
आ चाँद तुझे होशियार करूं

इतनी लंबी रात ‘मुन्तज़िर’
मैं कैसे तुझपे ऐतबार करूं

(2)
न कोई हकीकत तेरे सिवा अच्छा ये भी है
न किसी भी काम में मज़ा अच्छा ये भी है

बलखा के यूँ चलना मेरा शजर सा गिरना
मस्ते नाज हुस्न की अदा अच्छा ये भी है

तेरी बातें तेरी आहें मेरा यूँ जिंदा ही मरना
तेरी हस्ती का एक मुद्दा अच्छा ये भी है 

रूठे रूठे थे कल पर कल तो खूब बात की
मतलब मुझसे नहीं गिला अच्छा ये भी है

मेरा हर कीमती सामान आज तुम पे कैसे
कल नशे में दिया था क्या अच्छा ये भी है

तेरे दिल के दर पर कोई खटखट नहीं होती
अब नहीं सुनाई देती सदा अच्छा ये भी है

रहमतों पे जी लिए अब तुम्हें मरना होगा
कुछ नहीं है मर्ज़ की दवा अच्छा ये भी है

कई लोगों को कहते ये सुना था कल मैंने
‘मुन्तज़िर’ इतना नहीं बुरा अच्छा ये भी है


(3)
तुझमें शामिल हैं आग लगाने वाले
मुझमें शामिल हैं आग बुझाने वाले

सबको अपने काम से काम है यारों
सच में इतने अच्छे हैं ज़माने वाले

तुझको जाना है तो संभल के जाना
कोई भी शिकवा नहीं है जाने वाले

कई लोग करते हैं अहदे-वफ़ा जानां
कई लोग आते हैं दिल दुखाने वाले

इनके दामन में दुनिया के अश्क हैं
बस ये लोग लगते हैं खजाने वाले

पिछली सिम्त में बैठ जाते हैं यारों
कुछ सुनते क्यूँ नहीं ये सुनाने वाले

तुझे कोई नहीं समझता ‘मुन्तज़िर’
तेरे सब दोस्त कहाँ है पुराने वाले

अहदे-वफ़ा = प्रेम का प्रण
सिम्त = पंक्ति
  

Thursday, October 03, 2013

गज़ल: आज शाम चाहे नशा कम सा हो

आज शाम चाहे नशा कम सा हो
जो भी हो साकी दम-ब-दम सा हो 

गर सुर्ख होठों का निशाना है गर्दन
तो ख्वाहिश है मेरी जखम सा हो

मैं खुद ही बन जाऊंगा एक दास्ताँ
बस मेरा चाहने वाला कलम सा हो

आजिज़ आ चुका हूँ इस तन्हाई से
यारों कोई न कोई तो हम सा हो

हमसे तुझको बस गम ही तो मिले
जो मिले इस दफा मरहम सा हो

ये तीरे-पुर-सितम भी क्या सितम
अब तो जालिम कुछ बेरहम सा हो

ए जनाजे एक आखिरी ख्वाहिश
कातिल का भी दामन नम सा हो

झूठी खबरें भी मान लेता ‘मुन्तज़िर’
मगर उसमें कुछ तो दम सा हो

दम-ब-दम = प्राय:, बार-बार
आजिज़ = शक्तिहीन, उदासीन
तीरे-पुर-सितम = अत्याचारपूर्ण तीर

गज़ल: कल समंदर हार गया एक नदी से

कल समंदर हार गया एक नदी से
बेचारा कोशिश में था एक सदी से

बस नाकामियों ने इतनी समझ दी
आशिकों को मौत आ गई खुशी से

अँधेरे से अँधेरे में बात कर ली है
कितनी उम्मीदें रखें अब रौशनी से

वो लड़का भूल बैठा है अपना रस्ता
रोज दो दफा जाता था इस गली से

क्या तुमको है लोगों ने ठुकरा दिया
हमने भी रिश्ता तोड़ लिया सभी से

यहाँ तो रेत दर रेत है ‘मुन्तज़िर’
कहीं मर न जाना इस तिश्नगी से

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