Wednesday, July 25, 2012

' परिंदा '



पिंजरा खोला देखा मैंने, उसे आस नहीं थी उड़ने की,
जिद्द शायद खो दी थी उसने, सलियों से लड़ मरने की,
ये गम था एक परिंदे का, या गम की एक गवाही थी,
क्या सच में उड़ना भूल गया, या फिर उसकी चतुराई थी ?

कैसे आखिर बंद हुआ ये, कैसे किस्मत इसकी छली गयी?
कैसे आखिर जी लेता है, जब खुशियाँ इसकी चली गयीं ?
ये भूल चुका है, चिर-परिचित और मित्रों की भाषाओँ को,
या माँ के दाना लाने को और उन पेड़ों की शाखाओं को ?
ये गम था एक परिंदे का...........................
क्या सच में उड़ना भूल गया......................

अपने पंखो से नापी दुनिया इसको सही - सही लगती है,
ख़ामोशी भी इसकी जैसे गाथा कही - कही लगती है |
खुला गगन और मुक्त पवन, अब तो कुछ भी रहा नहीं,
आखिर हम क्या सहते है, जब इसने कुछ भी कहा नहीं |
ये गम था एक परिंदे का...........................
क्या सच में उड़ना भूल गया.......................

Wednesday, June 06, 2012

आँखें

उन खूबसूरत आँखों की प्रतीक्षा में ये प्रतीक्षारत आँखें 


आँखें

बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

कदम दर कदम, झील में है उतरना,
हो चाहत डुबोने की, फिर क्या संभलना ?
इनकी गहराईयों में है, जन्नत हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

इनके आंसू भी अब जैसे गंगा समान  ,
पलकें झुकते ही लगतीं हैं पीर का ज्ञान |
बना दीजिये हाँ, अब तो ये किस्मत हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

नज़रों को तुम यूँ न ऐसे घुमाओ,
खड़ा पास हूँ, अब तो दिल में बसाओ |
इन आँखों से दिल तक हैं राहें हमारी,
बहुत खूबसूरत हैं ये आँखें तुम्हारी,
इन आँखों पे टिकती नज़र है हमारी |

सादर : अनन्त भारद्वाज

Tuesday, May 08, 2012

मेरी भी चाहत है ऐसी...

मैंने कई बार श्रृंगार की कवितायेँ लिखीं, पर कहीं न कहीं ऐसा लगा कि एक कवि का राष्ट्रधर्म उस पर हावी हो रहा है, और हो भी क्यूँ न ? 'राष्ट्रकवि' मैथिलीशरण गुप्त कहते है वह ह्रदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
कविता के माध्यम से मैंने एक गीतकार, चित्रकार, शिक्षक और नवयुवक की उस मनोदशा को कहा है, जो अपनी प्रेमिका से माफ़ी चाहते हैं, क्यूंकि उनका राष्ट्रधर्म उन्हें बुला रहा है | कविता एक प्रयोग है, जिसमें ४ पंक्तियाँ श्रृंगार में और ४ पंक्तियाँ ओज में व्यक्त की हैं | प्रयोग कहीं ठीक-ठीक हुआ हो तो आपका आशीष चाहता हूँ | कविता का एक अंश प्रस्तुत है, आपकी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं, तो जल्द ही इसे पूर्ण करूँगा -

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तुझ पर गीत लिखूँ और गाऊँ मैं |
मेघ-मल्हारों, कोयल-पंछी,
वाले राग सुनाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं राग नहीं गढ़ सकता हूँ |
भारत माता पीड़ा में है,
गान नहीं लिख सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तुझ पर ही मिट जाऊं मैं |
मुझको हर पल चाहने वाली,
तेरा ही चित्र बनाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं रंग नहीं भर सकता हूँ |
मुझको जयचंदों से लड़ना है,
बस धरा लाल कर सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
तेरा नाम पढाऊँ मैं |
कुमकुम-अक्षत, कंगन-बिंदिया,
से तेरा रूप सजाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं रूप सजा नहीं सकता हूँ |
माँ पर कालिख पोती गयी,
वो बात भुला नहीं सकता हूँ ||

मेरी भी चाहत है ऐसी,
चाँद-सितारे लाऊँ मैं |
प्रेम-ज्ञान मुझको भी आता,
संग चलूँ सिखलाऊँ मैं |
पर तुम मुझको माफ करो,
मैं साथ नहीं चल सकता हूँ |
माँ बेटों से छली गई,
आघात नहीं सह सकता हूँ ||

सादर : अनन्त भारद्वाज 

Saturday, May 05, 2012

यूँ न दीपक जला

एक पंक्ति जो शायद आज-कल प्रत्येक लड़की कहती है “सारे लड़के एक जैसे होते है” ; मेरे मन में अक्सर खटकती है | तब पहली बार पुरुष के समर्थन में और इस पंक्ति के विरोध में एक गीत लिखा | गीत को पढ़ने से पहले कुछ इसकी भूमिका के बारे में कह दूँ, ताकि बात सीधी-सीधी आप तक पहुँचे | गीत के माध्यम से एक नवयुवक लड़कियों द्वारा किये गए भावनात्मक शिकार से बचना चाहता है, जो कहीं न कहीं उन्हें रिझाने का प्रयास करतीं है | परन्तु वह प्रकृति के नियमों से भी वाकिफ़ है | इसलिए अंत में एक समझौता करता है कि कुछ तुम बदलो, कुछ हम | प्रेम को एक आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाये, ताकि उसमें प्रदर्शन नहीं, दर्शन दिखे, लोगों को सीख मिले और नयी संस्कृति को आयाम |
गीत प्रस्तुत है - 


लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब में काव्य - पाठ

यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |
मैं पुरुष हूँ सदा, मेरे मन की व्यथा,
क्यूँ इतिहास में हर कली को ठगा?
न फूलों का मोह, फिर क्यूँ भँवरा बनूँ,
ये कलंक है जो आज मिट जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

न पतंगे उड़ा, ना हीं पल्लू घुमा,
एक तपस्वी भी कब तक बचा था भला?
जो उर्वशी-सी लगीं, मेनका-सी सजीं,
तो निमंत्रण यूँ मुझको फिर मिल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

प्रेम यदि हो प्रिये, भाव-समर्पण प्रिये,
जब हो मीरा दिवानी, राधे रानी प्रिये,
अर्चना तब करूँ, बनके थाली सजूँ
सैकड़ो ज्योति का दीप जल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा ||

सादर : अनन्त भारद्वाज 

Thursday, April 12, 2012

“ कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ? ”




कविता जो भ्रष्टाचार , विभाजन, आरक्षण, गरीबी, गन्दी राजनीति, गुलामी के आसार, सीमा- युद्ध, अभिवावकों का अनादर, बेरोजगारी जैसे देश में व्याप्त तमाम आयामों को जोड़कर मैंने २ वर्ष पूर्व लिखी ..

दिल की संवेदनाओ  को मैं मार कैसे दूं
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?
पथ भ्रष्ट हो गया, पथिक भ्रष्ट  हो गया,
गाँधी और सुभाष का ये राष्ट्र भ्रष्ट  हो गया,
चंद रुपयों को भाई भाई भ्रष्ट  हो गया,
जगदगुरु- सा मेरा देश भ्रष्ट  हो गया..
राम राज्य लाने वाली सरकार कैसे दूं?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

भ्रष्टाचार की खातिर शत्रु सीमा से सट जाते हैं  ,
बुनियादी आरोपों से अब संसद तक पट जाते हैं ,
मानचित्र में हर साल राज्य बट जाते हैं,
भारत माता के कोमल अंग कट जाते हैं..
इस अखंड राष्ट्र को आकर कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आरक्षण  विधान कर नेता यूँ सो जाते हैं,
मेहनतकश बच्चे खून के आंसू रो जाते हैं,
कर्म करते -करते कई युग हो जाते हैं,
कलयुग  के कर्मयोगी पन्नो में खो जाते हैं,
कृष्ण ने जो दे दिया वो सार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

माँ अपने बच्चे को ममता से सींच देती है,
मंहगाई  की मार गर्दनें खीच देती है,
रोटी के अभाव में माँ बच्चा फेंक देती है,
फिर भी पेट ना भरा तो जिस्म बेच देती है,
इस पापी पेट को आहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

एक लाठी वाला पूरी दुनिया  पे छा गया,
दूजा  सत्ताधारी तो चारा तक खा  गया,
चम्बल के डाकुओं को संसद  भी भा  गया,
शायद जीत जायेगा लो चुनाव   गया,
ऐसे भ्रष्ट नेता को विजय हार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

तिब्बत चला गया अब कश्मीर चला जायेगा ,
यदुवंशी  रजवाड़ों  में जब बाबर घुस  आएगा ,
देश का  सिंघासन चंद सिक्कों में बँट जायेगा ,
तब बोलो भारतवालो तुम  पर क्या रह जायेगा  ?
आती  हुई  गुलामी  का समाचार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

सीमा  के खतों  में हिंसा तांडव करती  है,
सूनी  राखी  देख कर बहिन रोज़ डरती  है,
नयी दुल्हन सेज पर रोज़ मरती है,
और बूढी  माँ की आँखें रोज़ जल भरती है,
माँ को बेटे की लाश का उपहार कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

आज के भी दशरथ चार पुत्रों को पढ़ाते है,
फिर भी चार पुत्रों पर वो बोझ बन जाते है,
कलयुग में राम कैसे मर्यादा निभाते है ?
राम घर मौज ले और दशरथ  वन  जाते है,
ऐसे  राम को दीपों की कतार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?

मानव अंगों का व्यापार यहाँ खिलता  है,
शहीदों के ताबूतों  में कमीशन भी मिलता है,
बेरोज़गारों  का झुण्ड चौराहों  पे दिखता है,
"फील गुडकहने से सत्य नहीं छिपता  है,
देश की प्रगति  को रफ़्तार  कैसे दूं ?
और कविता को बुनने का आधार कैसे दूं ?


Tuesday, March 13, 2012

स्मृतियाँ

उन प्यार करने वालों के नाम जिन्हें अपनी बीती ग़ज़ल हर रोज याद आती है... 
और दिल भूलना चाहता है उस परी को; पर आँखें भी.. क्यूँ  हर  दिन अज़ीब  से मंज़र दिखाती है, कि उसकी यादों की ओढ़नी रोज़ कुछ घटनाओ  के सहारे उडी चली आती है | उन्ही छोटी - छोटी प्यार भरी घटनाओ को समेटती  एक कविता जो मैंने अपनी इंजीनियरिंग के दौरान लिखी थी |

भारत तकनीकि संस्थान, मेरठ ( उत्तर प्रदेश )
 में कविता "स्मृतियाँ" का काव्य पाठ

वीडियो भी है, 

मुझ पर क्लिक तो कीजिये :)  
हर आस मिटा दी जाती है, हर सांस  सुला दी जाती है |
फिर भी यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ चली आती है ||
उन यादों में खो जाता हूँ, बस तू ही दिखाई देती है,
ठीक उसी पल दरवाजे पर एक आहट सी सुनाई देती है |
हम बिस्तर  से दरवाजे तक दौड़े - दौड़े फिरते हैं ,
पर वो तो हवा के झोकें थे जो मजाक बनाया करते हैं |
दिल घर की छत के एक किनारे बैठा आहें भरता है,
दो हंसो का जोड़ा नदिया के पानी में क्रंदन करता है |
जब हंसो के करुण विनय से नदिया तक भर जाती है,
तब यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ  चली आती है ||


उन भूली - भटकी यादों को कैसे मैंने बिसराया है,
तेरे हर ख़त को मैंने उस उपवन में दफनाया है |
उन ख़त के रूठे शब्दों  से पुष्प नहीं खिल पाते है,
शायद तेरे भेजे गुलाब मुझे नहीं मिल पाते है |
जन्मदिवस की संध्या पर जब जश्न मनाया जाता है,
सारा घर भर जाता है हर कक्ष सजाया जाता है |
जब वो भुला चुकी है मुझको तो हिचकी क्यूँ आ जाती है ?
तब यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ  चली आती है ||


अर्धरात्रि के सपनों में वो सहसा ही आ जाती है,
मेरे सुन्दर समतल जीवन में तरल मेघ सी छा जाती है |
प्रथम बिंदु से मध्य बिंदु तक  मुझे रिझाया करती है,
मध्य बिंदु से अंत तक वो शरमाया करती है |
मैं अक्सर खिल जाता हूँ जब वो अधरों को कसती है,
बिलकुल बच्ची  सी लगती है जब वो होले से हँसती है |
जब रोज़ सवेरे उसकी बिंदिया टुकड़ों  में बँट जाती है,
तब यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ  चली आती है ||


शायद रूठ गयी है मुझसे या फिर कोई रुसवाई है,
तेरे पाँव की पायल मैंने अपने आँगन में पाई है |
आज अचानक खनकी पायल मुझको यूँ समझती है,
अब और खनक ना पाऊँगी यह कहकर मुझे रुलाती है |
और गली के नुक्कड़ पर जब कुछ बच्चे खेलने आ जाते है,
घंटों हुई बहस में एक - दूजे का सर खा जाते है |
जब वो छोटी लड़की उन सबको भाषण सा दे जाती है,
तब यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ  चली आती है || 


कैसे मैंने उस नीले फाटक वाले घर का पता भुलाया है?
क्यूँ नहीं पहले ख़त को उसने तकिये के नीचे सुलाया है?
मैंने हर शाम उन उपहारों की होली जलती देखी है,
उन उपहारों के साथ रखी वो कलियाँ ढलती देखी है |
हम बंद अँधेरे कमरे में कविता तक लिख लेते है,
पर कलम कागज के मध्य शब्द तेरे ही सुनाई देते है |
जब प्रणय गीत लिखते - लिखते कलम अचानक रुक जाती है,
तब यादों के पन्नो से कुछ स्मृतियाँ  चली आती है ||

Tuesday, January 31, 2012

मेरी प्रकाशित रचनाएँ

(1) आज का दिन भी बहुत अच्छा रहा...
बहुत बहुत धन्यवाद Vishal Gupta, जिनके द्वारा मुझे मेरे जन्मदिन पर प्रेषित अमूल्य उपहार की प्राप्ति हुई - हरिवंशराय बच्चन की "मेरी श्रेष्ठ कवितायेँ " पुस्तक |

और मेरी दो रचनाओं को वेब पत्रिका "रचनाकार" द्वारा सराहा गया और प्रकाशित किया गया..
आप भी पढ़िए और मुझे अपनी राय दीजिए..
पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक कीजिये..
                                                                                                              ( 31 january 2012, 8:34pm )


उनमे से एक लिंक ये भी था,,मेरी एक कविता जिसने मुझे "नव्या पब्लिकेशन " के साहित्यकारों की सूची में खड़ा किया..आप भी पढ़िए और मुझ तक अपनी प्रतिक्रियाएं भेजिए.

मेरी एक कविता के लिए चले आइये.. लिंक पर क्लिक कीजिये..
1.   तुम तो भूल गई थी शायद

                                                                                                                 ( 17 feb, 2012, 10:05 pm )

(3) कई वरिष्ठ कवि एवं लेखकों जो कि अच्छे साहित्यकार के रूप में कार्य कर रहे है,
उनके साथ मेरी एक प्रिय कविता "स्मृतियाँ " छपी है..


क्रमांक - 15. अनंत भारद्वाज

                                                                                                 ( 16 feb, 2012 )



Friday, January 20, 2012

कुछ सामान तो होना चाहिए

बेरोजगारी की समस्या कोई "आम" और "नयी" बात नहीं.. और हमारी सरकार इतने ठोस कदम उठा रही है,
कि अगर किसी ने कुछ कहा तो उसे संघ का सदस्य बताया जायेगा, जैसे संघ कोई क्रन्तिकारी "आतंकवादियों" का संगठन हो, खैर छोडो बेरोजगारी तो बहुत दूर वो तो पीने का पानी भी मुहैया नहीं करा पाए है, और १५ रुपये की "बिस्लरी" की बोतल पर कहते है, हमने तरक्की कर ली...
मुद्दे पर आता हूँ, कुछ समय पहले ट्रेन से यात्रा कर रहा था, कुछ बेरोजगार नवयुवकों को बातें करते सुना था,
बहुत परेशान थे | शायद अपने पिता के लाखों रुपये फूंक देने के बाद भी कोई नौकरी न होना ही एक मात्र कारण था |
सचमुच वो व्यक्ति इतना थक चुका था, की उसकी जिंदगी जीने की चाह भी जा रही थी |
मैं नहीं जानता कि उसने क्या किया होगा ?
एक गज़ल लिखने कि कोशिश भर कर पाया.....


करो जिद्, सजाओ कमरा, कुछ सामान तो होना चाहिए,
पढ़े लिखे फकीरों में मेरा नाम तो होना चाहिए|

दौलत क्या चीज़ पता न था, शौहरत कमाने में रहा,
शौहरत कमाकर थक गया कुछ आराम तो होना चाहिए|

कल ही सुना था घर के इक शख्स से वो लब्ज़,
तालीम लेकर थक गया कुछ काम तो होना चाहिए|

इंसान भी अब बिक रहा है, काश सच हो ये खबर, 
धो लूं मुँह, मेरा भी कुछ दाम तो होना चाहिए|

सादर:अनन्त भारद्वाज

Monday, January 02, 2012

अब ट्रेन के पहिये कुछ थम रहे थे


हाल ही में ट्रेन से सफर करने का मौका आया,
रास्ता लंबा था, और ये कड़क ठण्ड..
माँ सरस्वती की कृपा से एक नयी कविता लिख पाया : 



एक सर्द रात के बाद,
कुछ अलसाई-सी धूप करवट बदल रही थी,
सैकडों जिन्दा कहानियों को लेकर,
ट्रेन वैसे ही रुक रुक के चल रही थी |

कुछ-एक बच्चों का झुण्ड,
आपस में खेल-खिलखिला रहा था,
अपने अपने नए गर्म कपड़ों पे इतरा रहा था |
कोई नन्हे हाथों से,
अपनी टोपी उतारने का प्रयास कर रहा था,
तो कोई माँ के हाथों से बने,
स्वेटर में चमकते बटन को निहार रहा था | 

चाय-चाय की वो आवाज़,
बर्थ से नीचे उतारने लगी |
स्टेशन का नाम देखने बुद्धि,
खिडकी के बाहर झाँकने लगी | 
गंतव्य है बहुत दूर ये सोचकर,
बुझे मन से ट्रेन के अंदर ही नज़र दौडाई,
कि हर एक कहानी देखकर खुशी फिर से लौट आई |

एक जवान की दो बेटियाँ,
जो समय से पहले यौवन की सीढियाँ चढ रहीं थीं,
खुद के चतुर होने को हर पल प्रमाणित कर रहीं थीं | 
एक जवान का, तो दूसरी माँ का,
पूरा पक्ष ले रही थी,
बड़ी शायद सचमुच बड़ी थी,
तभी नैतिकता की दलीलें दे रही थी |

और तीन नौजवान पूरी रात,
खुद के खर्चीलेपन पर दंभ तो भर रहे थे, 
पर चाय की चुस्कियों, चिप्स के पैकेटों के साथ,
बेरोजगारी की बातें कर रहे थे |

कुछ बुजुर्गों का गुट,
अपने अनुभवों से राजनेताओं पर आरोप मढ़ रहा था,
कुछ संभव तो कुछ असंभव आयाम गढ़ रहा था |
कई घटनाओं,
तारीखों से भरा मन गागर था |
कुछ उनसे सुनना, कुछ कहना था,
पर ध्यान क्यूँ खिडकी से बाहर था?

सुईयां देखने का भी कोई फायदा नहीं,
जैसे सर्दियों में,
गाड़ी और समय का कोई वायदा नहीं |
पर आज मन "हमेशा-जैसानहीं है,
क्यूँ कि कोई हाथों में चोकलेट लिए,
बैठी है इंतज़ार में,
अकेली? सुबह से ही?
स्टेशन पर या प्लेटफोर्म टिकेट की कतार में?
अब ट्रेन के पहिये कुछ थम रहे थे
और लाखों सवाल धड-धड कर रहे थे|

Friday, December 16, 2011

“ ग़ज़लों को तुम चोरी कर लो ”

ग़ज़लों को तुम चोरी कर लो, नाम तो उन तक जायेगा,
और लब्ज़ करेंगे ऐसा जादू, काम मेरा हो जायेगा |

बेमतलब तो नहीं लिखता मैं आज भी ज़माने में,
कोई पढ़ेगा, कोई सुनेगा, कोई तो अपनाएगा |

सोच लोगे, देख लोगे, मान लो हथिया भी लिया,
जो जन्नत में भी रूठ गए, तो उनको कौन मनाएगा ?

सुन खुदा; ना करना रहम, उसकी किसी करतूत पर,
लगी ज़रा सी चोट अगर, माँ को तो दिखलाएगा |

नक्काशी भी ताजमहल की, सिला दे गयी मजदूरों को,
भूख है पर हाथ नहीं, अब खाना कौन खिलाएगा ?

नाहक ही ढोते हो दौलत, पत्थर खुश करने को तुम,
हाथ में जो ले लो रोटी, भेष बदल चला आयेगा |

Thursday, December 15, 2011

पुष्प नहीं खिलते हैं, बंद कमरों में...


कल मैं अखबार के,
कोई चौथे पन्ने एक लेख पढ़ रहा था,
कुछ शेष था, कि
एक गहरे मंथन में ढूब गया था |

दिल्ली में हर रोज,
कुछ कलियाँ ,
कुछ आवारा भँवरों का शिकार हो रही हैं,
सह पायीं वेदना तो सह गयीं,
अन्यथा,
खुली आँखों से, खुले बदन,
खुली सड़कों पर सो रही हैं |

फिर सोचा,
क्या इतना ‘खुलापन’ ठीक है ?
या फिर ये भी पश्चिम से आई,
सभ्यता की सीख है |
कुछ तो है,
सच में हाँ, कुछ तो है, 
ये “स्लटवाक” यूँ ही तो नहीं हो रहीं ,
या फिर,
खुली आँखों से, खुली सड़कों पे,
खुले बदन, 
ये कलियाँ यूँ ही तो नहीं सो रहीं |

खैर छोडो,
कारन कोई भी हों,
साल, काल कोई भी हों,
जिम्मेदार है आवारा भँवरे ,
आज नहीं,
सदा से |
शायद फूलों के निर्माता ने ही उन्हें बनाया था,
प्रकृति में हों सकें और जन्म,
क्या मात्र इसीलिए,
फूलों को सजाया था ?
पर आवारा कैसे हों गए ये?
विषय है शोध का,
कोई अवतार क्यूँ नहीं लेता,
समय है क्रोध का |
आवारा तो रावन भी न था,
जैसा मैंने रामायण में पढ़ा है ,
क्यूँ शेर के दांत गिनने वाला,
दु:शासन बना खड़ा है ?

छोटा नहीं,
बड़ा दु:शासन |
जो किसी दुर्योधन के अधीन,
नहीं रहता है,
बस रोज नई द्रोपदियों का,
मान मर्दन करता है,
बस कुछ क्षणिक,
दैहिक सुख के लिए,  
फिर चाहे वो जन्मित कली हों या ,
परागहीन पुष्प |

आखिर कब तक?
कब तक,
ऐसे आवारा भँवरे ??
कब तक ???
दमन तो संस्कारी रावण का भी हुआ था न,
और होता है आज तक,
हर पर्व पर,
आवारा भँवरों को जलाने का भी,
पर्व बनाओ,
हर साल न सही,
एक बार तो...

क्यूँ कि,
पुष्प नहीं खिलते हैं,
बंद कमरों में...
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