Saturday, May 05, 2012

यूँ न दीपक जला

एक पंक्ति जो शायद आज-कल प्रत्येक लड़की कहती है “सारे लड़के एक जैसे होते है” ; मेरे मन में अक्सर खटकती है | तब पहली बार पुरुष के समर्थन में और इस पंक्ति के विरोध में एक गीत लिखा | गीत को पढ़ने से पहले कुछ इसकी भूमिका के बारे में कह दूँ, ताकि बात सीधी-सीधी आप तक पहुँचे | गीत के माध्यम से एक नवयुवक लड़कियों द्वारा किये गए भावनात्मक शिकार से बचना चाहता है, जो कहीं न कहीं उन्हें रिझाने का प्रयास करतीं है | परन्तु वह प्रकृति के नियमों से भी वाकिफ़ है | इसलिए अंत में एक समझौता करता है कि कुछ तुम बदलो, कुछ हम | प्रेम को एक आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाये, ताकि उसमें प्रदर्शन नहीं, दर्शन दिखे, लोगों को सीख मिले और नयी संस्कृति को आयाम |
गीत प्रस्तुत है - 


लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब में काव्य - पाठ

यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |
मैं पुरुष हूँ सदा, मेरे मन की व्यथा,
क्यूँ इतिहास में हर कली को ठगा?
न फूलों का मोह, फिर क्यूँ भँवरा बनूँ,
ये कलंक है जो आज मिट जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

न पतंगे उड़ा, ना हीं पल्लू घुमा,
एक तपस्वी भी कब तक बचा था भला?
जो उर्वशी-सी लगीं, मेनका-सी सजीं,
तो निमंत्रण यूँ मुझको फिर मिल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा |

प्रेम यदि हो प्रिये, भाव-समर्पण प्रिये,
जब हो मीरा दिवानी, राधे रानी प्रिये,
अर्चना तब करूँ, बनके थाली सजूँ
सैकड़ो ज्योति का दीप जल जायेगा |
यूँ न दीपक जला, मन मेरा मनचला,
आँसू जब-जब गिरेंगे, ये बुझ जायेगा ||

सादर : अनन्त भारद्वाज 

2 comments:

The Warrior said...

last stanza shaandaar hai.. bandhuvar!

The Warrior said...
This comment has been removed by the author.
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